जब कोई दंपति कई महीनों या सालों तक कोशिश करने के बावजूद गर्भधारण नहीं कर पाता, तो अक्सर दोनों पार्टनर के फर्टिलिटी टेस्ट करवाए जाते हैं। महिलाएँ और पुरुष, दोनों की जांच जरूरी है, लेकिन कई बार पुरुष अपनी जांच करवाने में झिझक जाते हैं।
पुरुषों की फर्टिलिटी को समझने के लिए पहला और सबसे महत्वपूर्ण टेस्ट होता है स्पर्म टेस्ट, जिसे मेडिकल भाषा में सीमन एनालिसिस (Semen Analysis) कहा जाता है।
यह टेस्ट यह पता लगाने में मदद करता है कि पुरुष के शुक्राणु pregnancy को support करने के लिए सक्षम और स्वस्थ हैं या नहीं। इसकी मदद से जल्दी, सही और प्रभावी इलाज की दिशा मिलती है।
स्पर्म टेस्ट (Semen Analysis) क्या होता है?
स्पर्म टेस्ट एक लैब टेस्ट है जिसमें पुरुष के वीर्य (Semen) की गहराई से जांच की जाती है। वीर्य में मौजूद शुक्राणुओं की संख्या, उनकी गति, आकार और उनकी गुणवत्ता pregnancy होने में बड़ा रोल निभाती है।
इस टेस्ट के जरिए डॉक्टर यह समझ पाते हैं कि पुरुष के शुक्राणु कितने मजबूत हैं, कितनी तेजी से अंडाणु तक पहुँच सकते हैं, और क्या वे एक स्वस्थ गर्भधारण को सपोर्ट कर सकते हैं।
अगर pregnancy में कठिनाई आ रही हो, low sperm count का संदेह हो या long-term sexual weakness महसूस हो रही हो, तो यह टेस्ट सबसे सही दिशा दिखाता है।
स्पर्म टेस्ट क्यों ज़रूरी होता है?
स्पर्म टेस्ट इसलिए भी बेहद जरूरी है क्योंकि पुरुषों से जुड़ी fertility समस्याएँ अक्सर बिना किसी लक्षण के होती हैं। कई बार पुरुषों को लगता है कि उनकी sexual performance ठीक है, इसलिए sperm भी ठीक होंगे, लेकिन यह सच नहीं होता। Semen Analysis इन स्थितियों में अत्यधिक जरूरी है:
- 1 साल तक कोशिश करने के बावजूद भी पत्नी गर्भवती न हो
- शुक्राणु की कमजोरी या कमी का संदेह
- इरेक्शन की दिक्कत या जल्दी स्खलन की समस्या
- वैरिकोसील जैसी स्थिति
- डायबिटीज या थायरॉयड जैसी बीमारियों का होना
- पहले हुए इंफेक्शन या सर्जरी का इतिहास
- अस्वस्थ जीवनशैली (स्मोकिंग, शराब, ज़्यादा तनाव)
स्पर्म टेस्ट जल्दी समस्या का पता लगा देता है ताकि समय रहते इलाज हो सके और pregnancy की संभावना बढ़ सके।
स्पर्म टेस्ट कैसे किया जाता है? पूरी प्रक्रिया समझें
स्पर्म टेस्ट करवाना बहुत आसान है और बिल्कुल painless प्रक्रिया है। इसमें किसी भी तरह की दवाई, इंजेक्शन या दर्द शामिल नहीं होता। इसकी प्रक्रिया इस प्रकार होती है:
- पुरुष को लैब या क्लिनिक में एक साफ और स्टरलाइज़्ड कंटेनर दिया जाता है।
- हस्तमैथुन (masturbation) के माध्यम से वीर्य का सैंपल लिया जाता है।
- कुछ क्लिनिक में विशेष मेडिकल कंडोम की मदद से भी सैंपल लिया जा सकता है, ताकि स्पर्म को कोई नुकसान न हो।
- इसके बाद सैंपल की गाढ़ापन, मात्रा, स्पर्म की संख्या, आकार और उसकी गति को माइक्रोस्कोप से जांचा जाता है।
- जांच की रिपोर्ट आमतौर पर 24 घंटे के भीतर मिल जाती है।
पूरी प्रक्रिया सिर्फ 10-15 मिनट का समय लेती है और बेहद सरल होती है।
स्पर्म टेस्ट से पहले क्या सावधानियाँ रखें?
टेस्ट सही और accurate आए, इसके लिए कुछ तैयारी जरूरी होती है:
- टेस्ट से 2-3 दिन पहले किसी भी तरह का यौन संबंध या हस्तमैथुन न करें
- टेस्ट से पहले शराब और धूम्रपान पूरी तरह बंद रखें
- यदि कोई संक्रमण, बुखार या दवाई चल रही हो, तो डॉक्टर को पहले से बताएं
- सैंपल देने के लिए केवल साफ और स्टरलाइज़्ड कंटेनर का उपयोग करें
- सैंपल देने के बाद 30-60 मिनट के अंदर लैब में जमा कर दें
- सैंपल को बहुत गर्म या बहुत ठंडा होने से बचाकर रखें
इन सावधानियों से रिपोर्ट बिल्कुल सटीक आती है और डॉक्टर सही diagnosis कर पाते हैं।
स्पर्म टेस्ट में क्या-क्या चेक किया जाता है? – 4 मुख्य बातें
स्पर्म टेस्ट में sperm की कुल क्वालिटी को चार मुख्य parameters के आधार पर देखा जाता है:
1. शुक्राणुओं की संख्या (Sperm Count)
यह देखा जाता है कि वीर्य में कितने sperm मौजूद हैं।
सामान्य शुक्राणुओं की संख्या 15 मिलियन प्रति mL या इससे अधिक, कम count होने पर fertilization की संभावना कम हो जाती है क्योंकि sperm अंडाणु तक नहीं पहुँच पाते।
2. शुक्राणुओं की गति (Motility)
यह जांच बताती है कि sperm कितनी तेजी से और किस दिशा में चल रहे हैं।
40% या उससे अधिक sperm का सक्रिय रूप से आगे बढ़ना ज़रूरी है।
अच्छी motility वाला sperm आसानी से अंडाणु तक पहुँचकर fertilization कर सकता है।
3. शुक्राणुओं का आकार (Morphology)
Sperm का shape (head, tail, midpiece) सही होना जरूरी है।
- 4% या उससे अधिक सामान्य आकार वाले sperm पर्याप्त माने जाते हैं।
असामान्य आकार वाला sperm अंडाणु को fertilize नहीं कर पाता।
4. वीर्य की मात्रा (Semen Volume)
वीर्य की कुल मात्रा भी fertility में भूमिका निभाती है।
- सामान्य मात्रा: 1.5–5 mL
बहुत कम मात्रा sperm count या ejaculation की समस्या का संकेत देती है।
स्पर्म टेस्ट की रिपोर्ट कब “खराब” मानी जाती है?
रिपोर्ट असामान्य तब मानी जाती है जब:
- स्पर्म की संख्या बहुत कम हो
- स्पर्म की गति या चलने की क्षमता कम हो
- स्पर्म का आकार-प्रकार सामान्य न हो
- वीर्य में स्पर्म बिल्कुल मौजूद न हों
- वीर्य की मात्रा बहुत कम हो
ऐसी स्थितियों में डॉक्टर आगे के जाँच जैसे हार्मोन की जाँच (खून की जाँच), अंडकोष का अल्ट्रासाउंड या आनुवंशिक जाँच कराने की सलाह दे सकते हैं।
अगर स्पर्म टेस्ट खराब आए तो क्या करें?
ज़्यादातर मामलों में शुक्राणुओं की गुणवत्ता जीवनशैली सुधारने से ही जल्दी बेहतर होने लगती है, क्योंकि शरीर में नए शुक्राणु हर 70-90 दिनों में बनते हैं।
आप इन उपायों से sperm quality तेज़ी से सुधार सकते हैं:
- धूम्रपान और शराब पूरी तरह बंद करें
- तले-भुने, मसालेदार और बाज़ार के पैकेट वाले भोजन से दूरी रखें
- ज़िंक, फोलिक अम्ल और विटामिन-ई वाले खाद्य पदार्थ बढ़ाएँ
- रोज़ाना 30-40 मिनट शारीरिक व्यायाम करें
- रात की नींद 7-8 घंटे पूरी लें
- अत्यधिक गर्मी से बचें (भाप स्नान, बहुत गर्म पानी से नहाना, गोद में रखकर यंत्र चलाना)
- मन को शांत रखें और तनाव कम करें
- आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ लें (अश्वगंधा, गोक्षुरा, शतावरी, विचित्रा, काउच बीज)
इन सभी उपायों का शुक्राणुओं की संख्या, गति और आकार-प्रकार पर बहुत ही सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
स्पर्म टेस्ट की कीमत कितनी होती है?
भारत में सीमन एनालिसिस की कीमत आमतौर पर: ₹300 – ₹1500 और शहर, लैब और रिपोर्ट की डिटेलिंग पर निर्भर करता है
क्या स्पर्म टेस्ट से गर्भधारण की पूरी जानकारी मिलती है?
स्पर्म की जाँच केवल पुरुष की जनन-क्षमता की स्थिति बताती है। लेकिन गर्भधारण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें दोनों की बराबर भूमिका होती है, इसलिए स्त्री की जाँच भी उतनी ही आवश्यक होती है।
महिलाओं में डिंबोत्सर्जन की जाँच, हार्मोन की जाँच और पेट का अल्ट्रासाउंड जैसी परीक्षाएँ कराई जाती हैं ताकि उनकी प्रजनन-क्षमता की पूरी स्थिति समझी जा सके।
निष्कर्ष
स्पर्म की जाँच एक सरल जो पुरुष की जनन क्षमता की सटीक स्थिति बताती है। सही समय पर यह जाँच करवाने से शुक्राणु से जुड़ी समस्याओं का जल्दी पता लग जाता है और उपचार समय पर शुरू हो पाता है।
सही दिनचर्या, भोजन और आयुर्वेदिक उपायों से शुक्राणुओं की गुणवत्ता में सुधार लाया जा सकता है। अगर कई महीनों से गर्भधारण नहीं हो रहा है, तो स्पर्म की जाँच कराना एक समझदारी भरा कदम है।
इससे आगे के इलाज की दिशा स्पष्ट होती है और स्त्री पर अनावश्यक जाँचों का बोझ भी कम होता है, जिससे पूरी प्रक्रिया आसान हो जाती है।

